तमनार के नागरमुड़ा में ‘विकास बनाम वन’ का टकराव: पेड़ों की कटाई पर घिरा प्रबंधन, ग्रामीणों ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
रायगढ़/तमनार।
सावन की बारिश के बीच तमनार ब्लॉक का नागरमुड़ा गांव इन दिनों एक नए विवाद का केंद्र बन गया है। प्रस्तावित कोयला खदान परियोजना के लिए हो रही बड़े पैमाने पर वन कटाई ने स्थानीय स्तर पर असंतोष की आग भड़का दी है। जहां एक ओर इसे औद्योगिक विकास की दिशा में जरूरी कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इसे अपने पर्यावरण और अस्तित्व पर सीधा खतरा मान रहे हैं।
ग्रामीणों की नाराजगी: “हमारी सहमति के बिना क्यों?”
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि जिस जमीन और जंगल से उनका जीवन-यापन जुड़ा है, उसी पर बिना स्पष्ट सहमति के मशीनें चल रही हैं। उनका कहना है कि न तो ग्रामसभा की भूमिका को पर्याप्त महत्व दिया गया और न ही जनभावनाओं को ध्यान में रखा गया।
कई ग्रामीणों ने यह भी कहा कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि उनके जीवन, परंपरा और आजीविका का आधार है। ऐसे में अंधाधुंध कटाई से उनका भविष्य असुरक्षित हो सकता है।
प्रशासन का पक्ष: “नियमानुसार मिली है अनुमति”
इस पूरे मामले में वन विभाग ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि प्रस्तावित खदान परियोजना के लिए वैधानिक प्रक्रिया के तहत 15,537 पेड़ों की कटाई की स्वीकृति दी गई है। विभाग के अनुसार, सभी आवश्यक अनुमतियां और औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही यह कार्रवाई की जा रही है।
हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि कटाई निर्धारित सीमा और नियमों के भीतर ही होनी चाहिए।
आरटीआई कार्यकर्ताओं के आरोप: “जमीन पर हकीकत अलग”
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब क्षेत्र में सक्रिय आरटीआई कार्यकर्ताओं ने प्रशासनिक दावों पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि वास्तविक कटाई की संख्या और अनुमति के आंकड़ों में अंतर हो सकता है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि मशीनों के जरिए तेजी से हो रही कटाई की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।
पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर चिंता
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि तमनार क्षेत्र पहले से ही औद्योगिक गतिविधियों के कारण दबाव में है। ऐसे में बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र के खत्म होने से भू-जल स्तर में गिरावट, जैव विविधता में कमी और वन्यजीवों के आवास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि इस तरह की गतिविधियों पर संतुलित दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया, तो आने वाले समय में इसका असर स्थानीय जलवायु और जनजीवन दोनों पर दिखाई देगा।
जांच और पारदर्शिता की मांग
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि विकास परियोजनाएं जरूरी हैं, लेकिन उन्हें पारदर्शिता और स्थानीय सहभागिता के साथ ही लागू किया जाना चाहिए।
फिलहाल नागरमुड़ा में हालात संवेदनशील बने हुए हैं। एक ओर मशीनों की आवाज है, तो दूसरी ओर ग्रामीणों का विरोध—अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस टकराव को संवाद और संतुलन के जरिए सुलझा पाता है या नहीं।

