February 5, 2026

जब भविष्य दांव पर लगी हो: शिक्षक और अभिभावक क्यों नहीं बोलते?

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सरकारी आदेशों के पालन और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के बीच शिक्षक आज एक कठिन द्वंद्व का सामना कर रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या शिक्षक केवल आदेशों का पालन करने तक सीमित रह गए हैं, या उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता भी करनी चाहिए?

विद्यालयों में लागू किए जा रहे सरकारी फरमानों का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, मानसिक विकास और भविष्य पर पड़ रहा है। इसके बावजूद न तो शिक्षक खुलकर विरोध कर पा रहे हैं और न ही अभिभावक अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। यह स्थिति तब और भी चिंताजनक हो जाती है जब यह देखा जाता है कि स्कूलों में पालकों के संगठन मौजूद होने के बावजूद उनकी भूमिका केवल कागजों तक सीमित रह गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षक समाज का आईना होते हैं और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे बच्चों के हित में आवाज उठाएं। वहीं अभिभावक, जो बच्चों के भविष्य के सबसे बड़े हितधारक हैं, वे भी सरकारी दबाव या सामाजिक भय के कारण मौन साधे हुए हैं।

शिक्षा केवल आदेशों से नहीं चलती, बल्कि संवेदनशीलता, संवाद और जिम्मेदारी से चलती है। यदि शिक्षक, पालक और उनके संगठन मिलकर बच्चों के हित में सवाल नहीं उठाएंगे, तो आने वाली पीढ़ी इसका खामियाजा भुगतेगी।

अब जरूरत इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था में शामिल हर पक्ष अपनी जिम्मेदारी समझे और बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता दे, न कि केवल सरकारी फरमानों का निर्विवाद पालन करे।


सरकारी और निजी स्कूलों के बच्चों की पढ़ाई और अच्छे अंकों में अंतर अक्सर देखने को मिलता है। इसका कारण बच्चों की प्रतिभा नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई व्यावहारिक पहलू हैं।

मुख्य कारण:

1. संसाधनों की उपलब्धता: निजी स्कूलों में स्मार्ट क्लास, लैब, पुस्तकालय और सहायक सामग्री अधिक होती है।


2. शिक्षक-छात्र अनुपात: सरकारी स्कूलों में कक्षाएँ अक्सर बड़ी होती हैं, जिससे व्यक्तिगत ध्यान कम मिल पाता है।


3. पढ़ाई का वातावरण: निजी स्कूलों में अनुशासन, नियमित मूल्यांकन और प्रतियोगी माहौल पर अधिक ज़ोर होता है।


4. अभिभावकों की भागीदारी: निजी स्कूलों में माता-पिता की निगरानी और सहयोग अपेक्षाकृत अधिक रहता है।


5. प्रशासनिक चुनौतियाँ: सरकारी स्कूलों में तबादले, गैर-शैक्षणिक कार्य और सीमित प्रशिक्षण पढ़ाई को प्रभावित करते हैं।



निष्कर्ष:
यदि सरकारी स्कूलों में संसाधन, शिक्षक प्रशिक्षण और निगरानी मज़बूत की जाए, तो वहाँ के बच्चे भी उतने ही अच्छे अंक और उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं। अंतर बच्चों में नहीं, व्यवस्था में है।

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