अच्छे पत्रकार का अस्तित्व क्या है ?
न वो सुरक्षित है न स्वतंत्र है✍️
पत्रकार को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है,सम्मान शब्दों में दिया जाता है, मंचों से अवार्ड से सराहा जाता है लेकिन सच्चाई ये है कि उसकी रीढ़ की हड्डी जानबूझकर कमजोर रखी गई है
न आर्थिक सुरक्षा,न स्थायी आय,न कोई ठोस सुरक्षा कानून,पत्रकार के पास सिर्फ़ एक चीज़ है सच बोलने की हिम्मत और यही हिम्मत आज सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है,जो सवाल उठाता है, वह दुश्मन बना दिया जाता है,जो सच लिखता है, उसकी नीयत पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं,और जो झुकने से इनकार करता है उसे धमकी, हमला या मौत तक झेलनी पड़ती है।
देश के “मालिकों” ने पत्रकार को ऐसा बना दिया है कि वह न पूरी तरह सुरक्षित है,न पूरी तरह स्वतंत्र,कोई बीमा नहीं,कोई पेंशन नहीं,कोई सरकारी सुरक्षा नहीं,कोई परिवार की गारंटी नहीं😐
फिर भी पत्रकार मैदान में खड़ा है ,क्योंकि अगर वह चुप हो गया,तो सच मर जाएगा और झूठ राज करेगा☝️
आज सवाल यह नहीं कि पत्रकार क्या है,सवाल यह है कि क्या यह देश सच में अपने पत्रकारों को ज़िंदा देखना चाहता है?

