June 8, 2026

“तेरे तो खाने वाले कोई नहीं” — एक कहावत और उसके पीछे छिपा भ्रम

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समाज में एक कहावत अक्सर सुनने को मिलती है— “इतना पैसा कमाकर क्या करेगा, तेरे तो खाने वाले कोई नहीं हैं।” यह बात सामान्यतः उस व्यक्ति से कही जाती है जिसने विवाह नहीं किया हो या जिसके बच्चे न हों। पहली दृष्टि में यह एक साधारण टिप्पणी लगती है, लेकिन यदि गहराई से देखा जाए तो यह जीवन, परिवार और संबंधों के बारे में हमारी सीमित समझ को भी प्रकट करती है।

यह कहावत मानकर चलती है कि मनुष्य की कमाई का वास्तविक उद्देश्य केवल पत्नी और बच्चों का पालन-पोषण करना है। मानो जीवन का अर्थ केवल अगली पीढ़ी तक सीमित हो। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है?

यदि किसी व्यक्ति ने विवाह नहीं किया, तो क्या उसके माता-पिता उसके अपने नहीं रहे? क्या उसके भाई-बहन, भतीजे-भांजे, रिश्तेदार, मित्र और समाज उससे अलग हो गए? क्या उसकी कमाई केवल उसी की तिजोरी में बंद रह जाएगी? वास्तव में एक व्यक्ति की कमाई और उसकी क्षमता का लाभ अनेक लोग उठा सकते हैं। परिवार का अर्थ केवल पत्नी और बच्चे नहीं होते, परिवार का अर्थ उन सभी लोगों से है जिनसे हमारा प्रेम, दायित्व और आत्मीयता जुड़ी हो।

आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह कहावत एक और गहरे भ्रम को जन्म देती है। यह मान लेती है कि मनुष्य कमाता ही इसलिए है कि कोई उसका धन उपभोग करे। जबकि जीवन का सत्य इससे कहीं बड़ा है। धन कमाने का उद्देश्य केवल किसी को खिलाना-पिलाना नहीं, बल्कि स्वयं को योग्य बनाना, अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना, जरूरतमंदों की सहायता करना और समाज में सकारात्मक योगदान देना भी है।

इतिहास में ऐसे अनेक महापुरुष हुए जिन्होंने विवाह नहीं किया, लेकिन उनका जीवन लाखों लोगों के लिए उपयोगी बना। उनका अर्जित ज्ञान, समय, परिश्रम और संसाधन समाज की धरोहर बने। यदि “खाने वाले” ही जीवन की सफलता का मापदंड होते, तो ऐसे लोगों का योगदान कैसे मापा जाता?

वास्तव में यह कहावत हमारे भीतर छिपी उस मानसिकता को दर्शाती है जिसमें संबंधों को उपयोगिता के आधार पर देखा जाता है। जब तक कोई व्यक्ति हमारी अपेक्षाएँ पूरी करता है, वह अपना लगता है; और जब वह हमारी अपेक्षाओं के ढाँचे में फिट नहीं बैठता, तो हम उसके जीवन को अधूरा मान लेते हैं। यह दृष्टि प्रेम की नहीं, स्वार्थ की दृष्टि है।

आध्यात्मिकता हमें सिखाती है कि संबंध स्वार्थ से नहीं, आत्मीयता से बनते हैं। माता-पिता माता-पिता इसलिए नहीं हैं कि वे हमारी कमाई का उपयोग करें, और बच्चे बच्चे इसलिए नहीं हैं कि वे हमारे धन के उत्तराधिकारी बनें। संबंधों का आधार प्रेम, कृतज्ञता और सहभागिता है, न कि आर्थिक लाभ।

सच्चाई यह है कि मनुष्य की कमाई का मूल्य इस बात से नहीं तय होता कि उसे खर्च करने वाले कितने लोग हैं, बल्कि इस बात से तय होता है कि उस कमाई ने कितनों का जीवन बेहतर बनाया। कोई व्यक्ति अपने माता-पिता की सेवा में धन लगाए, कोई समाज सेवा में, कोई शिक्षा या धर्मार्थ कार्यों में, और कोई अपने परिवार के पालन-पोषण में— प्रत्येक मार्ग सार्थक हो सकता है।

इसलिए जब कोई कहता है— “तेरे तो खाने वाले कोई नहीं हैं”, तो वह अनजाने में जीवन को बहुत छोटे दायरे में बाँध देता है। जीवन का उद्देश्य केवल उत्तराधिकारी छोड़ना नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को सार्थक बनाना है। जो व्यक्ति प्रेम, सेवा, करुणा और सदुपयोग की विरासत छोड़ जाता है, उसके “खाने वाले” नहीं, बल्कि उसके “आशीर्वाद पाने वाले” अनगिनत लोग होते हैं।

धन का मूल्य उसे विरासत में लेने वालों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग से तय होता है। और मनुष्य की महानता उसके परिवार के आकार से नहीं, बल्कि उसके हृदय की विशालता से मापी जाती है।

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