June 2, 2026

“पेलमा जनसुनवाई पर सुलगा जनाक्रोश:अडानी-एसईसीएल परियोजना के खिलाफ छह पंचायतें एकजुट, जनसुनवाई रोकने प्रशासन को अल्टीमेटम

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रायगढ़, 01 जून 2026।
तमनार क्षेत्र में प्रस्तावित एसईसीएल एमडीओ अडानी कंपनी की पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर ग्रामीणों में व्यापक असंतोष खुलकर सामने आ गया है। ग्राम पेलमा में 08 जून को आयोजित होने वाली जनसुनवाई को निरस्त करने की मांग करते हुए छह ग्राम पंचायतों के हजारों ग्रामीणों ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर स्पष्ट चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगों पर लिखित सहमति नहीं बनती, तब तक किसी भी परिस्थिति में जनसुनवाई नहीं होने दी जाएगी।

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यह विरोध केवल एक औपचारिक आपत्ति नहीं, बल्कि लंबे समय से लंबित मुआवजा, पुनर्वास और अधिकारों से जुड़े सवालों का संगठित विस्फोट माना जा रहा है। ग्राम जरीडीह, हिंझर, उरबा, लालपुर, पेलमा और मिलूपारा के ग्रामीणों ने एकजुट होकर प्रशासन को साफ संदेश दिया है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर उनकी उपेक्षा अब स्वीकार नहीं की जाएगी।

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ग्रामीणों का कहना है कि 24 मई 2026 को आयोजित विशेष ग्रामसभा में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया था कि जब तक प्रभावित परिवारों के लिए स्पष्ट और लिखित पुनर्वास एवं मुआवजा नीति तय नहीं होती, तब तक किसी भी प्रकार की जनसुनवाई का कोई औचित्य नहीं है।


विरोध के प्रमुख कारणों में सबसे बड़ा मुद्दा ‘समान मुआवजा’ का है। ग्रामीणों का आरोप है कि अलग-अलग गांवों के लिए मुआवजे की दरों में असमानता है, जो सामाजिक और आर्थिक असंतुलन को जन्म दे सकती है। उनका स्पष्ट कहना है कि सभी प्रभावित गांवों के लिए एक समान और पारदर्शी मुआवजा नीति तय किए बिना आगे बढ़ना अन्यायपूर्ण होगा।

इसके अलावा पुनर्वास को लेकर भी ग्रामीणों की मांगें बेहद स्पष्ट और सख्त हैं। उनका कहना है कि 2 एकड़ भूमि के बदले एक स्थायी सरकारी नौकरी दी जाए, और भूमिहीन परिवारों को मुआवजा एवं रोजगार में प्राथमिकता दी जाए।


गोंडवाना समुदाय के संदर्भ में भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है। ग्रामीणों ने मांग की है कि जिन परिवारों की जमीनें पूर्वजों के समय से सामूहिक पट्टों के रूप में दर्ज हैं, उन्हें भी समान रूप से मुआवजा और अधिकार मिलना चाहिए।


ग्रामीणों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि 08 जून को जबरन जनसुनवाई आयोजित की जाती है, तो 4000 से अधिक प्रभावित लोग लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन करेंगे। ऐसी स्थिति में कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी पूरी तरह प्रशासन की होगी।


MDO Adani
ज्ञापन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नई जनसुनवाई केवल तब आयोजित की जाए जब सभी मांगों पर लिखित समझौता हो जाए और ग्रामीणों की सहमति प्राप्त कर ली जाए।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में स्थानीय समुदायों की सहमति और सहभागिता को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है या नहीं। फिलहाल प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि वह संवाद और विश्वास के जरिए इस बढ़ते असंतोष को कैसे संभालता है।

अब निगाहें 08 जून पर टिकी हैं—जहां यह तय होगा कि प्रशासन संवाद का रास्ता चुनता है या टकराव की स्थिति बनती है।

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