“पुनर्वास अधूरा, गांव खाली कराने की जल्दबाजी? बरौद में SECL के खिलाफ ग्रामीणों का बड़ा विरोध”
“जब तक आखिरी ग्रामीण गांव में है, तब तक स्कूल, अस्पताल और पंचायत भवन को हाथ न लगाया जाए”
घरघोड़ा (रायगढ़)। रायगढ़ जिले के घरघोड़ा विकासखंड के ग्राम बरौद में एसईसीएल की खुली खदान परियोजना को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि एसईसीएल प्रबंधन बिना पूर्ण विस्थापन और पुनर्वास किए ही गांव की मूलभूत सुविधाओं को ध्वस्त करने की तैयारी कर रहा है। इस मुद्दे पर ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सामने आ गया है और उन्होंने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
ग्राम पंचायत बरौद की ग्रामसभा में पारित प्रस्ताव क्रमांक-06 (दिनांक 17 अप्रैल 2026) के अनुसार ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया है कि जब तक गांव का अंतिम परिवार भी वर्तमान स्थान पर निवास कर रहा है, तब तक स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन, आंगनबाड़ी और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं को किसी भी स्थिति में नहीं हटाया जाए। ग्रामसभा ने यह भी स्पष्ट किया है कि 70 प्रतिशत ग्रामीणों की लिखित सहमति के बिना किसी भी शासकीय भवन या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना स्वीकार्य नहीं होगा।
कलेक्टर और एसडीएम को सौंपा ज्ञापन
ग्रामीणों ने 25 मई 2026 को जिला कलेक्टर रायगढ़ एवं एसडीएम घरघोड़ा को ज्ञापन सौंपकर आरोप लगाया कि एसईसीएल प्रबंधन कोयला उत्पादन बढ़ाने के नाम पर गांव की आवश्यक सुविधाओं को जल्दबाजी में तोड़ने का प्रयास कर रहा है। ज्ञापन में पूर्व माध्यमिक एवं प्राथमिक शाला, आंगनबाड़ी केंद्र, अस्पताल भवन, ग्राम पंचायत कार्यालय, राजीव गांधी भवन, उचित मूल्य दुकान, सांस्कृतिक मंच, सड़कें और चौक-चौराहों जैसी सार्वजनिक परिसंपत्तियों को सुरक्षित रखने की मांग की गई है।
“पहले पूर्ण विस्थापन, फिर खदान विस्तार”
प्रभावित परिवारों का कहना है कि जब तक प्रत्येक परिवार का समुचित पुनर्वास नहीं हो जाता, तब तक बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं को खत्म करना उनके संवैधानिक एवं मानवीय अधिकारों का उल्लंघन होगा। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि बच्चों की पढ़ाई और मरीजों के उपचार को प्रभावित कर खदान विस्तार का कोई भी प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंची शिकायत
मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीणों ने शिकायत की प्रतियां राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, खान सुरक्षा महानिदेशालय (धनबाद) तथा जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को भी भेजी हैं। ग्रामीणों की मांग है कि एसईसीएल की कथित मनमानी पर तत्काल रोक लगाकर पहले पुनर्वास प्रक्रिया को पूर्ण किया जाए।
ग्रामीणों का दो टूक संदेश
“जब तक गांव का आखिरी व्यक्ति यहां रह रहा है, तब तक स्कूल, अस्पताल, पंचायत भवन और अन्य जनसुविधाओं को नहीं छुआ जा सकता। पहले सम्मानजनक पुनर्वास, फिर खदान विस्तार।”
बरौद के ग्रामीणों की यह एकजुटता अब प्रशासन और एसईसीएल दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा जिले की सबसे बड़ी जनसरोकार की लड़ाई के रूप में उभर सकता है।


