जीवन और मृत्यु के बीच की यात्रा : केवल समय बिताना नहीं, कुछ विशेष बन जाना
मनुष्य जन्म लेता है, बढ़ता है, रिश्ते बनाता है, मित्र और शत्रु दोनों पाता है, सुख-दुःख का अनुभव करता है और अंततः एक दिन शरीर का त्याग कर देता है। पहली दृष्टि में यह यात्रा साधारण प्रतीत होती है, क्योंकि जन्म और मृत्यु का यह क्रम केवल मनुष्य तक सीमित नहीं है। संसार के सभी जीव जन्म लेते हैं, जीवन जीते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं। तब प्रश्न उठता है कि मनुष्य की विशेषता क्या है? उसे श्रेष्ठ प्राणी क्यों कहा गया है?
मनुष्य की श्रेष्ठता केवल उसके शरीर, बुद्धि या भाषा में नहीं है, बल्कि इस क्षमता में है कि वह अपने जीवन को एक उद्देश्य दे सकता है। वह केवल प्रकृति के बनाए हुए कार्यक्रम पर चलने के लिए नहीं जन्मा है। यदि उसका पूरा जीवन केवल भोजन, निद्रा, भय और मैथुन तक सीमित रह जाए, तो उसकी जीवन-यात्रा और अन्य जीवों की जीवन-यात्रा में बहुत अधिक अंतर नहीं रह जाता।
आज अधिकांश लोग जीवन को जीने के बजाय केवल समय व्यतीत करते दिखाई देते हैं। सुबह उठना, भोजन करना, काम पर जाना, धन कमाना, वापस लौटना, मनोरंजन करना, सो जाना और फिर अगले दिन उसी चक्र को दोहराना—यदि जीवन केवल इसी क्रम का नाम है, तो यह एक यांत्रिक अस्तित्व है, जागरूक जीवन नहीं। ऐसे व्यक्ति को यह भ्रम हो सकता है कि वह जीवन जी रहा है, जबकि वास्तव में वह केवल समय के प्रवाह के साथ बह रहा होता है।
जीवन का वास्तविक महत्व तब प्रकट होता है जब मनुष्य अपने भीतर की चेतना को जागृत करता है और स्वयं से पूछता है कि वह क्यों आया है, उसका उद्देश्य क्या है और वह इस संसार को क्या देकर जाएगा। विशेष उपलब्धियाँ केवल बाहरी सफलता, धन या प्रसिद्धि नहीं हैं। आत्मबोध, सत्य की खोज, मानवता की सेवा, ज्ञान का सृजन, समाज को नई दिशा देना या अपने भीतर की संभावनाओं को पूर्ण रूप से विकसित करना भी उतनी ही बड़ी उपलब्धियाँ हैं।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन व्यक्तियों ने मानवता को नई दिशा दी, उन्हें अपने समय में अक्सर विरोध का सामना करना पड़ा। कारण यह था कि वे प्रचलित धारणाओं और सीमित सोच से आगे देखने का साहस रखते थे। समाज प्रायः परिचित और सुरक्षित रास्तों को स्वीकार करता है, जबकि नए विचार उसे असहज करते हैं। इसलिए जो व्यक्ति सत्य की खोज में आगे बढ़ता है, वह कभी-कभी अकेला पड़ जाता है। लेकिन वही लोग आगे चलकर युगनिर्माता बनते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि समाज के सभी नियम गलत हैं या उनका विरोध करना ही महानता है। समाज व्यवस्था के लिए आवश्यक है, किंतु जब कोई नियम मनुष्य की चेतना, स्वतंत्र विचार और आत्म-विकास में बाधा बनने लगे, तब विवेकपूर्वक उसका परीक्षण करना आवश्यक हो जाता है। अंधानुकरण मनुष्य को भीड़ का हिस्सा बना सकता है, परंतु जागरूक चिंतन उसे एक स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाता है।
जीवन और मृत्यु के बीच की यह छोटी-सी यात्रा केवल अस्तित्व बनाए रखने के लिए नहीं मिली है। यह स्वयं को जानने, अपनी क्षमताओं को पहचानने और कुछ ऐसा करने का अवसर है जो हमारे जाने के बाद भी अर्थपूर्ण बना रहे। जो व्यक्ति केवल इंद्रियों की तृप्ति में जीवन व्यतीत कर देता है, वह समय तो गुजार लेता है, परंतु जीवन का सार नहीं जान पाता। जबकि जो व्यक्ति अपने भीतर की चेतना को विकसित करता है, अपने अस्तित्व का उद्देश्य खोजता है और संसार में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बनता है, वही वास्तव में जीवन जीता है।
अतः मनुष्य का लक्ष्य केवल जन्म लेना, जीवित रहना और मृत्यु को प्राप्त होना नहीं होना चाहिए। उसके जीवन में कोई ऐसा उद्देश्य, कोई ऐसा सत्य, कोई ऐसी उपलब्धि अवश्य होनी चाहिए जो उसे सामान्य प्रवृत्तियों से ऊपर उठाए। क्योंकि जीवन की सफलता वर्षों की संख्या से नहीं, बल्कि उस चेतना और योगदान से मापी जाती है जो मनुष्य अपने पीछे छोड़ जाता है।
जीवन का सार यही है—पशु समान केवल जीना नहीं, बल्कि जागरूक होकर कुछ ऐसा बन जाना कि जीवन और मृत्यु के बीच की यात्रा सार्थक हो जाए।

