राजस्व ज़मीन से लकड़ी की खुली लूट
तमनार “पुष्पा स्टाइल” तस्करी कांड में तहसील–पटवारी की भूमिका पर गंभीर सवाल
रायगढ़।
तमनार वन परिक्षेत्र में सामने आया “पुष्पा स्टाइल” लकड़ी तस्करी का मामला अब केवल वन अपराध तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रकरण सीधे-सीधे राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली, निगरानी तंत्र और संभावित मिलीभगत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। जिस स्थान से खैर समेत बहुमूल्य लकड़ियों की कटाई और तस्करी की गई, वह राजस्व भूमि बताई जा रही है—और यहीं से पूरे सिस्टम की परतें खुलती नज़र आ रही हैं।
राजस्व भूमि पर तस्करी, बिना प्रशासन की जानकारी?
राजस्व भूमि पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, लट्ठों का भंडारण और फिर ट्रकों में भरकर रायपुर तक भेजने की तैयारी—यह सब बिना तहसील और पटवारी की जानकारी के हो जाए, यह मानना मुश्किल ही नहीं, लगभग असंभव है। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि
क्षेत्रीय पटवारी और तहसील स्तर के अधिकारी आखिर क्या कर रहे थे?
कागज़ों में सेमल, ज़मीन पर खैर
वन विभाग की प्रारंभिक जांच में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। दस्तावेज़ों में जहां सेमल जैसी सामान्य लकड़ी दर्शाई गई, वहीं मौके पर खैर और अन्य बहुमूल्य प्रजातियों के ठूंठ और कटे लट्ठे मिले।
यह साफ संकेत देता है कि तस्करी पूर्व नियोजित थी और रिकॉर्ड में जानबूझकर गुमराह करने का प्रयास किया गया।
यह खेल एक-दो दिन का नहीं, बल्कि महीनों या वर्षों से चल रहा प्रतीत होता है। ऐसे में राजस्व रिकॉर्ड, निरीक्षण और रिपोर्टिंग व्यवस्था की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगना लाज़िमी है।
राजस्व अमला मौन क्यों?
राजस्व भूमि पर किसी भी प्रकार की गतिविधि—चाहे वह पेड़ों की कटाई हो, खुदाई हो या परिवहन—पटवारी के नक्शे और तहसील कार्यालय के संज्ञान में आती है। इसके बावजूद इस पूरे प्रकरण पर राजस्व अमले की चुप्पी संदेह को और गहरा करती है।
क्या—
पटवारी ने जानबूझकर आंखें मूंद लीं?
तहसील स्तर पर मिलीभगत के चलते कार्रवाई नहीं हुई?
या फिर अवैध कमाई की हिस्सेदारी ने पूरे तंत्र को मौन कर दिया?
इन सवालों के जवाब केवल जांच से नहीं, बल्कि ईमानदार और कठोर कार्रवाई से मिलेंगे।
एनओसी की आड़ में बड़ा खेल
मामले में पंचायत स्तर से जारी की गई एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) भी अब संदेह के घेरे में है।
राजस्व भूमि से लकड़ी परिवहन के लिए:
किस अधिकार से एनओसी जारी की गई?
क्या इसके लिए तहसील से विधिवत अनुमति ली गई थी?
यदि एनओसी नियमों के विरुद्ध जारी हुई है, तो यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम के दुरुपयोग और आपराधिक साजिश का मामला बनता है।
सिर्फ तस्कर नहीं, जिम्मेदार भी कटघरे में
अब तक की कार्रवाई वाहन जब्ती और फरार आरोपियों की तलाश तक सीमित दिख रही है। लेकिन असली सवाल यह है—
क्या जांच की सुई सिर्फ तस्करों पर रुकेगी, या राजस्व और वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों तक भी पहुँचेगी?
यदि राजस्व अमले की भूमिका की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच नहीं हुई, तो यह साफ संदेश जाएगा कि छोटे मोहरों पर कार्रवाई कर बड़े चेहरों को बचाया जा रहा है।
जंगल नहीं, व्यवस्था लुटी है
तमनार का यह मामला केवल जंगल कटने की कहानी नहीं है। यह प्रशासनिक विफलता, संभावित सांठगांठ और जवाबदेही के अभाव की तस्वीर पेश करता है।
आज अगर राजस्व भूमि पर लकड़ी की तस्करी हो सकती है, तो कल यही ज़मीन खनन, अवैध कब्ज़े और संगठित अपराध का अड्डा भी बन सकती है।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है—
या फिर यह भी उन मामलों की फेहरिस्त में शामिल हो जाएगा,
जहाँ जंगल कट गए, फाइलें भर गईं और सवाल पूछने वाले खामोश कर दिए गए।

