विषय वासना का वास्तविक अर्थ: इंद्रियों का दमन नहीं, उन पर संयम ही सच्चा योग है
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मनुष्य के जीवन में एक बड़ा प्रश्न सदियों से विचारणीय रहा है कि यदि इंद्रियों की तृप्ति प्रकृति ने ही निर्धारित की है, यदि भूख, प्यास, स्पर्श, रूप, रस और गंध का अनुभव करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, तो फिर विषय वासना को आध्यात्मिक पतन का कारण क्यों माना गया है? क्या प्रकृति द्वारा दी गई किसी शक्ति का उपयोग करना गलत हो सकता है? और यदि ऐसा है, तो क्या योगेश्वर श्रीकृष्ण की शिक्षा मनुष्य को उसकी स्वाभाविक प्रकृति के विरुद्ध जाने के लिए कहती है?
नहीं। भगवद्गीता का संदेश इंद्रियों से युद्ध करना नहीं, बल्कि उनके स्वामी बनकर जीवन जीना है।
विषय वासना का वास्तविक अर्थ क्या है?
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन को मनुष्य के पतन की एक गहरी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया समझाई है।
> ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥— श्रीमद्भगवद्गीता 2.62
अर्थात मनुष्य जब निरंतर इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता है, तो उन विषयों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है और कामना में बाधा आने पर क्रोध उत्पन्न हो सकता है।
यहाँ विचार करने योग्य बात यह है कि भगवान श्रीकृष्ण ने केवल विषयों के अस्तित्व को समस्या नहीं बताया, बल्कि विषयों में मन का निरंतर उलझना और उनके प्रति आसक्त हो जाना पतन की प्रक्रिया का आरंभ बताया है।
भोजन करना विषय है, लेकिन स्वाद के पीछे इतना पागल हो जाना कि स्वास्थ्य और विवेक की उपेक्षा होने लगे, आसक्ति है। धन कमाना आवश्यकता है, लेकिन धन के लिए उचित-अनुचित का भेद मिटा देना वासना का रूप है। प्रेम करना स्वाभाविक है, लेकिन किसी व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की जिद करना मोह और आसक्ति है।
इसी प्रकार शरीर की स्वाभाविक आवश्यकताओं की पूर्ति करना और उन्हीं इच्छाओं का दास बन जाना, दोनों एक ही बात नहीं हैं।
प्रकृति ने इंद्रियों को शक्ति दी है, तो वह गलत कैसे हो सकती है?
यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आँखों को देखने की शक्ति मिली, कानों को सुनने की, जिह्वा को स्वाद लेने की, त्वचा को स्पर्श अनुभव करने की और मन को विचार करने की क्षमता मिली। इन शक्तियों के बिना संसार का अनुभव और सामान्य जीवन का संचालन संभव नहीं होता।
यदि इन शक्तियों का अस्तित्व ही गलत होता, तो मनुष्य के जीवन में इनकी आवश्यकता ही क्यों होती?
प्रकृति ने मनुष्य को भूख दी, ताकि वह भोजन ग्रहण करे। प्यास दी, ताकि वह जल ग्रहण करे। विश्राम की आवश्यकता दी, ताकि शरीर को पुनः कार्य करने की क्षमता मिले। प्रेम और संबंधों की अनुभूति दी, ताकि जीवन में अपनापन और सहयोग विकसित हो।
लेकिन प्रकृति ने मनुष्य को केवल इंद्रियाँ ही नहीं दीं, विवेक भी दिया है।
इंद्रियाँ किसी विषय का अनुभव कराती हैं, मन उसकी ओर आकर्षित हो सकता है और बुद्धि यह निर्धारित करने में सहायता करती है कि उस आकर्षण का अनुसरण करना उचित है या नहीं।
इसलिए गलती इंद्रियों की शक्ति में नहीं, बल्कि उस शक्ति के विवेकहीन उपयोग में होती है।
अग्नि भोजन भी पकाती है और असावधानी होने पर घर भी जला सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि अग्नि गलत है। इसका अर्थ यह है कि शक्ति का उपयोग मर्यादा और समझ के साथ होना चाहिए।
ठीक इसी प्रकार इंद्रियों की शक्ति प्रकृति की देन है, लेकिन उस शक्ति का प्रत्येक उपयोग उचित हो, यह आवश्यक नहीं।
इंद्रियों का दमन नहीं, उन्हें वश में करना चाहिए
भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में कहा है—
> कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥— श्रीमद्भगवद्गीता 3.6
अर्थात जो मनुष्य बाहरी इंद्रियों को रोककर बैठा रहता है, लेकिन मन ही मन विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मिथ्याचारी कहा जाता है।
इस श्लोक में भगवान मनुष्य को एक महत्वपूर्ण सत्य समझाते हैं। केवल शरीर को रोक लेना संयम नहीं है। यदि बाहर से मनुष्य विषयों से दूर दिखाई दे, लेकिन भीतर उसका मन उन्हीं इच्छाओं में डूबा रहे, तो उसका संयम अधूरा है।
दमन और संयम में यही अंतर है।
दमन में मनुष्य किसी इच्छा को जबरदस्ती दबाता है, लेकिन उसके भीतर संघर्ष बना रह सकता है।
संयम में मनुष्य अपनी इच्छा को पहचानता है, उसके परिणामों को समझता है और विवेक के आधार पर यह निर्णय लेता है कि उसे कितना महत्व देना है।
संयम का अर्थ यह नहीं कि भूख लगे तो भोजन न करो, प्यास लगे तो जल न पियो या संसार के सभी सुखों को त्याग दो। संयम का अर्थ है कि भोजन तुम्हारी आवश्यकता पूरी करे, लेकिन तुम स्वाद के गुलाम न बनो; धन तुम्हारे जीवन को व्यवस्थित करे, लेकिन तुम धन के लिए अपने चरित्र को न बेचो; संबंध तुम्हें प्रेम दें, लेकिन तुम उनमें अपनी स्वतंत्र बुद्धि और नैतिकता न खो दो।
यही इंद्रियों को वश में करने की दिशा है।
आवश्यकता और अति-आवश्यकता के बीच की मर्यादा
मनुष्य के जीवन में आवश्यकता और लालसा के बीच एक सूक्ष्म रेखा होती है। आवश्यकता की पूर्ति जीवन को संतुलित करती है, जबकि अनियंत्रित लालसा मनुष्य को असंतोष के चक्र में डाल सकती है।
भूख मिटाने के लिए भोजन करना आवश्यकता है, लेकिन पेट भर जाने के बाद भी केवल स्वाद के मोह में खाते रहना अतिरेक हो सकता है।
जीवनयापन के लिए धन कमाना आवश्यकता है, लेकिन कितना भी धन मिल जाए, फिर भी अधिक पाने की अंधी दौड़ में नैतिकता खो देना अतृप्त लालसा है।
शरीर को विश्राम देना आवश्यकता है, लेकिन कर्तव्य और स्वास्थ्य की उपेक्षा करते हुए आलस्य में डूबे रहना असंतुलन है।
इसी प्रकार कामना का होना अपने आप में मनुष्य के पतन का प्रमाण नहीं है। प्रश्न यह है कि वह कामना मर्यादित है या मनुष्य की बुद्धि पर अधिकार कर चुकी है।
यहाँ एक बात समझना भी आवश्यक है कि हर आवश्यकता की कोई एक निश्चित मात्रा सभी लोगों के लिए समान नहीं होती। उम्र, स्वास्थ्य, परिस्थिति और जीवन की जिम्मेदारियों के अनुसार आवश्यकताएँ बदल सकती हैं। इसलिए मर्यादा का निर्धारण केवल मात्रा से नहीं, बल्कि विवेक, स्वास्थ्य, कर्तव्य और दूसरों के अधिकारों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।
आवश्यकता जीवन को सहारा देती है, लेकिन जब इच्छा विवेक को पीछे छोड़ देती है, तब वही इच्छा बंधन बन सकती है।
क्या संसार के सुखों का अनुभव करना आध्यात्मिकता के विरुद्ध है?
यदि आध्यात्मिकता का अर्थ संसार से भाग जाना होता, तो भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि में कर्तव्य करने की शिक्षा क्यों देते?
अर्जुन के सामने युद्ध, परिवार, संबंध, कर्तव्य और जीवन-मरण का कठिन प्रश्न था। श्रीकृष्ण ने उन्हें संसार छोड़कर भागने को नहीं कहा, बल्कि मोह और भ्रम से ऊपर उठकर धर्मसम्मत कर्म करने का मार्ग दिखाया।
भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं—
> योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥— भगवद्गीता 2.48
अर्थात हे धनंजय! आसक्ति त्यागकर योग में स्थित होकर कर्म करो। सफलता और असफलता में समभाव रखना ही योग है।
इस शिक्षा का गहरा अर्थ है कि मनुष्य संसार में रहते हुए भी संसार की वस्तुओं का गुलाम बने बिना अपना कर्तव्य निभा सकता है।
भोजन करो, लेकिन भोजन ही जीवन का उद्देश्य न बन जाए। धन कमाओ, लेकिन धन ही तुम्हारी पहचान न बन जाए। परिवार से प्रेम करो, लेकिन प्रेम के नाम पर अधिकार और स्वार्थ को उचित न ठहराओ। सुखों का अनुभव करो, लेकिन सुख की अनुपस्थिति में जीवन को निरर्थक मत समझो।
आध्यात्मिकता संसार की प्रत्येक वस्तु को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके साथ अपने संबंध को समझना है।
विषय वासना मनुष्य को बाँधती कैसे है?
जब कोई इच्छा मन में उठती है, तब शुरुआत में वह केवल एक विचार होती है। मनुष्य चाहे तो उस विचार को समझ सकता है, स्वीकार कर सकता है या उससे आगे बढ़ सकता है।
लेकिन जब वह बार-बार उसी विषय का चिंतन करता है, तो मन उसमें सुख की कल्पना करने लगता है। फिर मनुष्य उस सुख को पाने की इच्छा करता है। इच्छा पूरी होने पर उसे कुछ समय के लिए संतोष मिलता है, लेकिन वही अनुभव दोबारा पाने की चाह भी पैदा कर सकता है।
धीरे-धीरे मनुष्य सुख का अनुभव करने के बजाय सुख की तलाश में जीने लगता है।
उसका वर्तमान भविष्य की किसी इच्छा के पीछे छूट जाता है। जो प्राप्त है, उसमें संतोष नहीं रहता; जो अप्राप्त है, वही सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देने लगता है।
यही वह अवस्था है जहाँ इच्छा मनुष्य के जीवन का एक छोटा-सा हिस्सा रहने के बजाय उसके जीवन को नियंत्रित करने लगती है।
भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
> आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥— भगवद्गीता 2.70
जैसे अनेक नदियों का जल समुद्र में प्रवेश करता है, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा में स्थिर रहता है, वैसे ही इच्छाओं के आने पर भी जो मनुष्य भीतर स्थिर रहता है, वही शांति प्राप्त करता है; इच्छाओं के पीछे भागने वाला नहीं।
यहाँ समुद्र का उदाहरण अत्यंत सुंदर है। समुद्र में जल आता रहता है, लेकिन वह प्रत्येक लहर के पीछे भागता नहीं। उसी प्रकार मनुष्य के भीतर इच्छाओं का उठना स्वाभाविक है, लेकिन प्रत्येक इच्छा को पूरा करना आवश्यक नहीं।
सच्चा संयम इच्छाओं का समाप्त हो जाना नहीं, बल्कि इच्छाओं के रहते हुए भी विवेक और आंतरिक संतुलन बनाए रखना है।
क्या योगेश्वर की शिक्षा प्रकृति के विरुद्ध है?
नहीं। भगवद्गीता की शिक्षा को इस दृष्टि से समझना चाहिए कि भगवान मनुष्य को उसकी प्राकृतिक शक्तियों से वंचित करने के बजाय उन शक्तियों का उचित संचालन सिखाते हैं।
प्रकृति मनुष्य को क्षमता देती है, लेकिन क्षमता का विवेकपूर्ण उपयोग करना उसके जीवन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। भूख लगना प्राकृतिक है, लेकिन किसी दूसरे का भोजन छीन लेना उचित नहीं। क्रोध उत्पन्न होना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन क्रोध में किसी को चोट पहुँचाना उचित नहीं। इच्छा का जन्म होना स्वाभाविक है, लेकिन इच्छा की पूर्ति के लिए किसी की स्वतंत्रता, सम्मान या अधिकारों का उल्लंघन करना उचित नहीं।
इसलिए प्रकृति द्वारा किसी शक्ति का दिया जाना और उस शक्ति का हर परिस्थिति में उचित उपयोग होना, दो अलग-अलग बातें हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का संदेश इंद्रियों को शत्रु मानने का नहीं, बल्कि उनके साथ विवेकपूर्ण संबंध स्थापित करने का है।
यहाँ तक कि भगवद्गीता के छठे अध्याय में भी योग के लिए संतुलित जीवन पर बल दिया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो आहार-विहार, कर्म, निद्रा और जागरण में संतुलित रहता है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है (गीता 6.17)।
अर्थात आध्यात्मिक जीवन केवल त्याग की चरम सीमा नहीं, बल्कि उचित संतुलन की साधना भी है।
इंद्रियों का स्वामी बनो, दास नहीं
मनुष्य के जीवन में इंद्रियाँ द्वार हैं, मन अनुभवों का केंद्र है और बुद्धि विवेक का साधन है। जब मनुष्य केवल इंद्रियों से मिलने वाले सुख को ही जीवन का अंतिम उद्देश्य मान लेता है, तब वह अपनी व्यापक चेतना और जिम्मेदारियों को भूल सकता है।
लेकिन जब वह अपनी आवश्यकताओं को पहचानते हुए, उनकी मर्यादा का सम्मान करते हुए और अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन जीता है, तब वही इंद्रियाँ उसके जीवन की सहयोगी बनती हैं।
इसलिए विषय वासना का प्रश्न केवल यह नहीं है कि मनुष्य क्या देखता है, क्या सुनता है, क्या खाता है या किस सुख का अनुभव करता है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वह इन अनुभवों का विवेकपूर्वक उपयोग कर रहा है, या अनुभवों की लालसा उसके विवेक पर शासन कर रही है?
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संसार से विमुख नहीं करना चाहते थे। वे उन्हें मोह से मुक्त होकर कर्तव्य करने की शिक्षा दे रहे थे। यही शिक्षा आज भी प्रत्येक मनुष्य के लिए प्रासंगिक है।
इंद्रियों को नष्ट करना आवश्यक नहीं, उन्हें समझना आवश्यक है। इच्छाओं से घृणा करना आवश्यक नहीं, उनके स्वभाव को पहचानना आवश्यक है। संसार को छोड़ना ही मुक्ति नहीं, संसार में रहते हुए आसक्ति और विवेकहीन लालसा से मुक्त होना भी आध्यात्मिक साधना है।
अंततः जीवन की वास्तविक स्वतंत्रता तब आरंभ होती है, जब मनुष्य यह समझ लेता है कि उसे हर इच्छा के पीछे चलना नहीं है और हर सुख को प्राप्त करना भी आवश्यक नहीं है।
जहाँ आवश्यकता मर्यादा में रहती है, वहाँ जीवन संतुलित रहता है। जहाँ इच्छा विवेक के अधीन रहती है, वहाँ मन शांत रहता है। और जहाँ मनुष्य इंद्रियों का दास बनने के बजाय उनका स्वामी बन जाता है, वहीं से सच्चे योग की यात्रा आरंभ होती है।