प्रकृति का न्याय: जहाँ जीवन है, वहीं परिवर्तन और मृत्यु भी है
मनुष्य अक्सर प्रकृति से शिकायत करता है। जब नदियों में बाढ़ आती है, लोग डूब जाते हैं, जंगलों में आग लगती है, भूकंप या तूफान आते हैं, तब वह पूछता है—”प्रकृति इतनी निर्दयी क्यों है?”
लेकिन वही मनुष्य शायद ही कभी यह सोचता है कि यही प्रकृति हर दिन उसे जीवन भी दे रही है।
जिस नदी को वह बाढ़ के समय दोष देता है, वही नदी पूरे वर्ष खेतों को सींचती है, प्यास बुझाती है, पशु-पक्षियों और करोड़ों जीवों का जीवन चलाती है। जिस अग्नि से कभी किसी का घर जल जाता है, उसी अग्नि से हर घर में भोजन पकता है, ठंड में गर्मी मिलती है और अनेक उपयोगी कार्य होते हैं।
समस्या प्रकृति में नहीं, हमारी सोच में है। हम केवल उस पक्ष को स्वीकार करना चाहते हैं जो हमारे लिए सुखद हो। हम चाहते हैं कि नदी पानी दे, लेकिन कभी बाढ़ न आए। आग भोजन पकाए, लेकिन कभी जलाए नहीं। हवा शीतलता दे, लेकिन कभी तूफान न बने। यह अपेक्षा प्रकृति से नहीं, हमारी कल्पना से पैदा होती है।
प्रकृति विरोधाभासों का संतुलन है। जहाँ निर्माण है, वहीं विनाश भी है। जहाँ सृजन है, वहीं परिवर्तन भी है। यदि नदी में बहाव न हो, तो वह जीवन नहीं दे सकती। यदि अग्नि में जलाने का गुण न हो, तो वह भोजन भी नहीं पका सकती। जिस शक्ति से लाभ होता है, उसी शक्ति से कभी-कभी हानि भी होती है।
मनुष्य जन्म का उत्सव मनाता है। घर में बच्चे के जन्म पर बधाइयाँ, संगीत और खुशियाँ होती हैं। लेकिन वही मनुष्य मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पाता। वह पूछता है—”मृत्यु क्यों होती है?” पर शायद ही कभी पूछता है—”जन्म क्यों होता है?”
सच्चाई यह है कि जन्म और मृत्यु एक ही चक्र के दो पहलू हैं। जो जन्म लेता है, वह एक दिन अवश्य मृत्यु को प्राप्त होगा। जो जुड़ता है, वह कभी न कभी टूटेगा। जो खिलता है, वह मुरझाएगा भी। यही प्रकृति का शाश्वत नियम है।
हमारा दुःख इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि हम जीवन का केवल आधा सत्य स्वीकार करते हैं। हम सुख चाहते हैं, लेकिन दुःख नहीं। लाभ चाहते हैं, लेकिन हानि नहीं। मिलन चाहते हैं, लेकिन बिछड़ना नहीं। जबकि प्रकृति किसी एक पक्ष पर नहीं चलती; वह संतुलन पर चलती है।
प्रकृति न किसी की शत्रु है, न किसी की पक्षधर। वह केवल अपने नियमों का पालन करती है। उसके नियमों में न पक्षपात है, न भावनाएँ। सूर्य सबके लिए उगता है, वर्षा सब पर होती है और समय सबको समान रूप से आगे बढ़ाता है।
जीवन की परिपक्वता इसी में है कि हम प्रकृति को उसके संपूर्ण रूप में स्वीकार करें। जब हम यह समझ लेते हैं कि जहाँ प्रकाश है, वहाँ छाया भी होगी; जहाँ जीवन है, वहाँ मृत्यु भी होगी; जहाँ लाभ है, वहाँ हानि की संभावना भी होगी—तब शिकायत कम और समझ अधिक जन्म लेती है।
प्रकृति को बदलने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसे समझने की आवश्यकता है। क्योंकि जिस कारण से हमें जीवन मिलता है, उसी कारण से कभी-कभी कठिनाइयाँ भी आती हैं। यदि हम उन कारणों को ही समाप्त कर दें, तो जीवन का आधार भी समाप्त हो जाएगा।
प्रकृति का संदेश स्पष्ट है—जीवन को संपूर्णता में स्वीकार करो। केवल सुख को नहीं, दुःख को भी; केवल जन्म को नहीं, मृत्यु को भी। क्योंकि इन्हीं दोनों के संतुलन से सृष्टि का अस्तित्व बना हुआ है।

