“8 जून की सुनवाई या सिर्फ औपचारिकता? पेलमा में भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षा”पेलमा परियोजना पर बढ़ता असंतोष
रायगढ़।
एसईसीएल की पेलमा ओपन कास्ट माइंस परियोजना की जनसुनवाई भले ही एक बार फिर टलकर अब 8 जून पर पहुंच गई हो, लेकिन इस बीच जो नहीं बदला है, वह है जमीन पर सिंमर करती बेचैनी। तारीखों का यह फेरबदल प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा जरूर हो सकता है, पर जिन लोगों के जीवन पर इस परियोजना की सीधी रेखा खिंचने वाली है, उनके लिए हर नई तारीख एक नई अनिश्चितता लेकर आती है।
करीब 2077 हेक्टेयर में फैली इस प्रस्तावित खदान से सालाना 15 मिलियन टन कोयला निकालने का लक्ष्य रखा गया है। फाइलों में यह आंकड़ा ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास का प्रतीक बनकर चमकता है, लेकिन पेलमा, उरबा, मडुवाडूमर, लालपुर, हिंझर, जरीडिह, खर्रा, सक्ता और मिलूपारा जैसे गांवों के लिए यही परियोजना अपने अस्तित्व के सवाल के रूप में सामने खड़ी है।
मुआवज़े का सवाल: विकास का असली चेहरा
ग्रामीणों की आवाज अब पहले से ज्यादा स्पष्ट और संगठित है। वे विकास के खिलाफ नहीं हैं—यह बात वे बार-बार दोहरा चुके हैं। उनका विरोध उस असमानता से है, जो अक्सर ऐसे प्रोजेक्ट्स के साथ चुपचाप लागू कर दी जाती है।
एक ही परियोजना, एक ही अधिग्रहण प्रक्रिया, लेकिन अलग-अलग गांवों के लिए अलग-अलग मुआवजा दर—यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि भरोसे के टूटने की शुरुआत है। ग्रामीणों की मांग सीधी है—समान जमीन, समान मुआवजा।
यह मांग इसलिए भी अहम है क्योंकि अतीत के अनुभवों ने उन्हें सिखाया है कि “विकास” के नाम पर तय शर्तें अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं।
जनसुनवाई: संवाद या औपचारिकता?
जनसुनवाई लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण औजार मानी जाती है—जहां प्रभावित लोग अपनी बात सीधे प्रशासन और परियोजना संचालकों के सामने रख सकते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग कहानी कहती है।
कई मामलों में जनसुनवाई महज एक औपचारिकता बनकर रह जाती है—आपत्तियां दर्ज होती हैं, फाइलों में संलग्न होती हैं, लेकिन अंतिम फैसलों पर उनका असर नगण्य होता है। यही कारण है कि 8 जून की जनसुनवाई को लेकर लोगों के बीच उम्मीद और अविश्वास दोनों साथ-साथ चल रहे हैं।
रायगढ़: ‘प्रोजेक्ट ज़ोन’ में बदलता भूगोल
पेलमा परियोजना अकेली नहीं है। रायगढ़ जिले का नक्शा तेजी से ‘प्रोजेक्ट ज़ोन’ में तब्दील होता जा रहा है। बिजारी, पोरडा-चिमटापानी, छाल, वेस्ट ऑफ बायसी और फुटहामुड़ा जैसे कोल ब्लॉक्स पहले से प्रक्रिया में हैं, जबकि नए स्टील प्लांट्स की योजनाएं भी दस्तक दे रही हैं।
इन सबके बीच एक समान सूत्र है—जंगलों की कटाई, जमीन का अधिग्रहण और स्थानीय आबादी का विस्थापन। विकास की इस रफ्तार में पर्यावरण और आजीविका का संतुलन लगातार पीछे छूटता नजर आता है।
हर नई तारीख, वही पुराने सवाल
जनसुनवाई की तारीख बदलना प्रशासनिक दृष्टि से सामान्य हो सकता है, लेकिन प्रभावित लोगों के लिए यह इंतजार की अवधि को और लंबा कर देता है। इस दौरान न तो उनकी जमीन सुरक्षित महसूस होती है और न ही उनका भविष्य।
हर बार नई तारीख के साथ यह सवाल फिर खड़ा होता है—
क्या इस बार उनकी बात सुनी जाएगी?
या फिर यह भी एक पूर्व निर्धारित प्रक्रिया का हिस्सा भर रह जाएगा?
8 जून: सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, भरोसे की कसौटी
पेलमा माइंस की आगामी जनसुनवाई अब केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं रह गई है। यह उस भरोसे की परीक्षा बन चुकी है, जो आम नागरिक व्यवस्था और उसके निर्णयों पर करते हैं।
यह दिन तय करेगा कि विकास का मॉडल संवाद, सहमति और न्याय के रास्ते पर चलेगा या फिर वही पुरानी पटकथा दोहराई जाएगी—जहां फैसले पहले लिखे जाते हैं और सुनवाई बाद में की जाती है।
अब निगाहें 8 जून पर हैं—
जहां सिर्फ एक परियोजना नहीं, बल्कि पूरे इलाके का भविष्य दांव पर होगा।

