June 21, 2026

पेलमा जनसुनवाई से पहले उबाल: जंगल–गांव बनाम खदान, विकास मॉडल पर फिर खड़े सवाल

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रायगढ़।
तमनार अंचल इन दिनों सिर्फ मौसम की गर्मी नहीं, बल्कि जनाक्रोश और बेचैनी की तपिश भी महसूस कर रहा है। पेलमा क्षेत्र में प्रस्तावित ओपन कास्ट कोयला खदान परियोजना ने एक बार फिर विकास और विस्थापन के पुराने विवाद को जिंदा कर दिया है।

एसईसीएल की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत करीब 2000 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन प्रस्तावित है, जिसमें 362 हेक्टेयर वन भूमि और लगभग 14 गांवों के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। कागजों में यह महज भूमि अधिग्रहण है, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह उनकी जमीन, पहचान और परंपरा के अस्तित्व का सवाल बन चुका है।




🔴 भरोसे का संकट गहराया

तमनार क्षेत्र के ग्रामीण विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन उनके अनुभव उन्हें सतर्क बना रहे हैं। बीते वर्षों में स्थापित उद्योगों और खदानों ने रोजगार और पुनर्वास के बड़े वादे किए थे, लेकिन जमीनी हकीकत में अधूरे पुनर्वास, बढ़ते प्रदूषण और सीमित रोजगार ने लोगों के भरोसे को कमजोर किया है।

ग्रामीणों का साफ कहना है—
“पहले जो वादे पूरे नहीं हुए, अब नए भरोसे की नींव कैसे रखें?”




🌿 पर्यावरण पर मंडराता खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र की कटाई केवल पेड़ों का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करेगी। जल स्रोतों के सूखने, भूजल स्तर में गिरावट और वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका पहले से जताई जा रही है।

रायगढ़ जिला पहले ही औद्योगिक दबाव झेल रहा है, ऐसे में एक और बड़ी खदान पर्यावरणीय संतुलन को और नाजुक बना सकती है।




📅 19 मई की जनसुनवाई बनी निर्णायक मोड़

अटल चौक, पेलमा में 19 मई को प्रस्तावित जनसुनवाई अब इस पूरे मुद्दे का केंद्र बन चुकी है। प्रशासन, कंपनी और ग्रामीण—तीनों अपने-अपने पक्ष के साथ तैयार हैं।

गांवों में लगातार बैठकें हो रही हैं, लोग अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हो रहे हैं। अब मुद्दा सिर्फ मुआवजे या नौकरी तक सीमित नहीं, बल्कि अस्तित्व, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ गया है।




❗ विकास बनाम अस्तित्व—बहस जारी

पेलमा परियोजना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विकास केवल संसाधनों के दोहन तक सीमित रहेगा, या उसमें स्थानीय समुदायों की सहमति और भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी।

19 मई की जनसुनवाई भले अंतिम फैसला न हो, लेकिन यह जरूर तय करेगी कि आगे की राह संवाद से निकलेगी या संघर्ष से।

फिलहाल तमनार की धरती पर सिर्फ खदान की योजना नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक और पर्यावरणीय टकराव की आहट साफ सुनाई दे रही है।

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