February 4, 2026

सराईटोला में महाजेनको–अडानी की बैठक, लिबरा कांड की आहट?

निजी ज़मीन नहीं, फॉरेस्ट लैंड खत्म होने की कगार पर… फिर किस आधार पर आगे बढ़ेगा खनन!

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जर्नलिस्ट चौहान/रायगढ़/तमनार छत्तीसगढ़।
रायगढ़। सराईटोला गाँव में महाजेनको के अंतर्गत संचालित एमडीओ अडानी खनन कंपनी द्वारा ग्रामीणों के साथ की गई बैठक पहली नज़र में भले ही “संवाद” का प्रयास लगे, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। यह पूरा घटनाक्रम कभी रायगढ़ को झकझोर चुके लिबरा भू-अर्जन कांड की याद दिला रहा है, जहाँ शुरुआत “बैठकों और आश्वासनों” से हुई थी और अंत भारी विवाद में।

सबसे बड़ा और चिंताजनक तथ्य यह है कि जिस फॉरेस्ट (गवर्नमेंट) लैंड पर फिलहाल खनन हो रहा है, वह लगभग समाप्त होने वाला है, और मौजूदा स्थिति में कंपनी के पास एक इंच भी निजी ज़मीन नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आगे खनन किस आधार पर होगा? क्या अब ग्रामीणों की ज़मीन पर नज़र है?

सरपंच की गैरमौजूदगी: साजिश या संयोग?

बैठक में ग्राम पंचायत के सरपंच की अनुपस्थिति ने पूरे संवाद की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए। जब गांव का संवैधानिक प्रतिनिधि मौजूद नहीं था, तो क्या यह बैठक केवल “औपचारिकता” भर थी? ग्रामीणों का कहना है कि पहले भी इसी तरह की बैठकों के बाद दबाव की राजनीति शुरू हुई है।

स्कूल मरम्मत का आश्वासन: कॉरपोरेट CSR या सहमति खरीदने की कोशिश?

जर्जर स्कूल भवन की मरम्मत पर सहमति ज़रूर बनी, लेकिन जानकार इसे “CSR के नाम पर सहमति बनाने की रणनीति” बता रहे हैं। लिब्रा कांड में भी शुरुआती दौर में सड़क, भवन और सुविधाओं के वादे कर ग्रामीणों को भरोसे में लिया गया था।

ब्लास्टिंग पर भरोसा, लेकिन अनुभव डराता है

ब्लास्टिंग को लेकर कंपनी ने नियमों और मानकों की बात की, लेकिन ग्रामीणों को पिछले अनुभव डराते हैं। कंपन, धूल और शोर ने पहले भी जनजीवन को प्रभावित किया है। सवाल यह है कि जब आगे खनन के लिए NOC की ज़रूरत पड़ेगी, तो क्या यह सब दबाव बनाकर हासिल करने की कोशिश होगी?

देवगुड़ी और श्मशान: आस्था बनाम मुआवजा

देवगुड़ी और श्मशान के मुआवजे पर “सकारात्मक चर्चा” की बात कही जा रही है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि आस्था का मोल पैसों से नहीं चुकाया जा सकता। लिब्रा प्रकरण में भी धार्मिक–सामाजिक स्थलों को लेकर बड़े विवाद हुए थे।

असल सवाल: अब NOC किससे और कैसे?

जब फॉरेस्ट लैंड खत्म हो रही है और निजी ज़मीन शून्य है, तो साफ है कि अब कंपनी को ग्रामीणों से NOC लेनी होगी। यही वह मोड़ है जहाँ से लिब्रा कांड की पटकथा शुरू हुई थी—पहले संवाद, फिर दबाव, और अंत में विवाद।

ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन जबरन सहमति, अधूरी जानकारी और भविष्य की अनिश्चितता उन्हें डरा रही है।

सराईटोला की यह बैठक केवल एक बैठक नहीं, बल्कि आने वाले बड़े संघर्ष की भूमिका भी हो सकती है। यदि समय रहते पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, तो रायगढ़ एक बार फिर लिबरा कांड जैसे भू-अर्जन विवाद का गवाह बन सकता है।

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