October 15, 2026

परमपिता का स्मरण करते हुए कर्म करो, संसार में रहकर भी उनसे जुड़े रहो

मनुष्य संसार में रहकर संसार के कार्यों में इतना खो जाता है कि धीरे-धीरे उसे…

file_00000000af608208a15d9f86ba748e29





मनुष्य संसार में रहकर संसार के कार्यों में इतना खो जाता है कि धीरे-धीरे उसे अपने अस्तित्व के मूल स्रोत, अपने परमपिता परमात्मा का स्मरण भी नहीं रहता। जबकि भगवान श्रीकृष्ण का संदेश है कि संसार के सभी कर्म करो, अपने कर्तव्यों का पालन करो, लेकिन अपने भीतर उस परम चेतना के स्मरण की ज्योति सदैव जलाए रखो, जिससे तुम्हारा अस्तित्व है।

भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

“तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।”
— श्रीमद्भगवद्गीता 8.7

अर्थात् हे अर्जुन! तुम हर समय मेरा स्मरण करो और अपने कर्तव्यरूपी युद्ध को भी लड़ो।

इस एक वाक्य में जीवन जीने की संपूर्ण कला छिपी हुई है। भगवान यह नहीं कहते कि संसार के सारे कर्म छोड़कर केवल मेरा स्मरण करो। वे कहते हैं कि अपने कर्म करते हुए मेरा स्मरण करो। अर्थात् तुम्हारे हाथ संसार के कार्यों में लगे रहें, तुम्हारा मन अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता रहे, लेकिन तुम्हारे हृदय का संबंध मुझसे बना रहे।

जैसे माता-पिता अपने बच्चों को याद करते हैं, वैसे ही परमपिता से संबंध बनाए रखो

जब कोई बच्चा अपने घर से दूर किसी दूसरे शहर में पढ़ने, नौकरी करने या अपने जीवन का निर्माण करने जाता है, तब उसके माता-पिता उसे विदा करते समय कहते हैं—बेटा, संभलकर जाना, अपना ध्यान रखना, समय पर खाना, और हमसे फोन पर बात करते रहना। हमें भूल मत जाना, हमारे संपर्क में बने रहना।

माता-पिता ऐसा इसलिए नहीं कहते कि बच्चा अपना काम छोड़कर दिनभर उनसे ही बात करता रहे। वे चाहते हैं कि बच्चा संसार में आगे बढ़े, अपने जीवन में सफलता प्राप्त करे, अपने कर्तव्यों को पूरा करे, लेकिन अपने घर और अपने माता-पिता से उसका संबंध कभी न टूटे।

बच्चा हजारों किलोमीटर दूर चला जाए, फिर भी माता-पिता के हृदय में उसके प्रति प्रेम बना रहता है। दूरी शरीरों के बीच होती है, प्रेम के बीच नहीं।

अब जरा विचार कीजिए, जब संसार के माता-पिता अपने बच्चों के प्रति इतना प्रेम और चिंता रखते हैं, तो उस परमपिता के प्रेम की विशालता क्या होगी, जिसने संपूर्ण सृष्टि को अस्तित्व प्रदान किया है?

हम संसार में जन्म लेते हैं, परिवार बनाते हैं, शिक्षा प्राप्त करते हैं, व्यवसाय करते हैं, धन कमाते हैं, सुख-दुःख का अनुभव करते हैं और जीवन की अनेक परिस्थितियों से गुजरते हैं। इन सबके बीच परमात्मा हमसे यह नहीं कहते कि तुम अपना संसार छोड़कर मेरे पास आ जाओ। उनका संदेश तो यह है कि संसार में रहो, अपने कर्म करो, लेकिन मुझे विस्मृत मत करो।

संसार तुम्हारा कर्मक्षेत्र है, लेकिन परमात्मा से तुम्हारा संबंध तुम्हारे जीवन का आधार है।

जो परमात्मा को नहीं भूलता, वह अकेला नहीं होता

भगवान श्रीकृष्ण का एक अत्यंत गहरा संदेश भगवद्गीता के नौवें अध्याय में मिलता है—

“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता 9.22

अर्थात् जो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हैं और मुझमें मन लगाए रखते हैं, उनके योगक्षेम का भार मैं वहन करता हूँ।

इस संदेश का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि जब मनुष्य अपने जीवन में परमात्मा के प्रति विश्वास, प्रेम और समर्पण बनाए रखता है, तब कठिन परिस्थितियों में भी वह स्वयं को पूरी तरह असहाय नहीं समझता। उसे अपने भीतर एक ऐसा सहारा अनुभव होता है, जो उसे टूटने से बचाता है और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

परमात्मा का स्मरण करने का अर्थ यह नहीं कि जीवन में कभी कठिनाई नहीं आएगी, कभी दुःख नहीं होगा या हर इच्छा पूरी हो जाएगी। इसका अर्थ है कि कठिनाइयों के बीच भी मनुष्य अपने विवेक, धैर्य, करुणा और सत्य के मार्ग को न छोड़े।

जिस प्रकार माता-पिता का स्मरण दूर रहने वाले बच्चे को अपने घर से भावनात्मक रूप से जोड़े रखता है, उसी प्रकार परमात्मा का स्मरण मनुष्य को अपने आध्यात्मिक मूल से जोड़े रख सकता है।

जब मनुष्य यह अनुभव करता है कि मैं संसार में अकेला अपने अहंकार के बल पर सब कुछ करने वाला नहीं हूँ, बल्कि एक व्यापक चेतना के समक्ष उत्तरदायी हूँ, तब उसके निर्णयों में विनम्रता और उसके कर्मों में पवित्रता आने लगती है।

परमात्मा का स्मरण संसार से भागना नहीं, संसार में सही ढंग से जीना है

अक्सर मनुष्य सोचता है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए उसे संसार के सारे संबंधों, जिम्मेदारियों और कार्यों को छोड़ना पड़ेगा। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में खड़े होकर उपदेश दिया था।

अर्जुन के सामने परिवार, संबंध, कर्तव्य, मोह, दुःख और असमंजस सब कुछ था। भगवान ने उसे संसार से भागने का मार्ग नहीं दिखाया, बल्कि मोह और भ्रम से ऊपर उठकर अपने कर्तव्य का पालन करने की शिक्षा दी।

यही शिक्षा हमारे जीवन में भी लागू होती है।

यदि तुम एक पिता हो, तो अपने बच्चों का पालन-पोषण करो। यदि तुम एक माता हो, तो अपने परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करो। यदि तुम नौकरी करते हो, तो ईमानदारी से अपना कार्य करो। यदि तुम व्यवसाय करते हो, तो सत्य और न्याय के मार्ग पर चलो।

लेकिन इन सबके बीच अपने भीतर यह स्मरण बनाए रखो कि तुम्हारा जीवन केवल धन कमाने, इच्छाओं को पूरा करने और संसार में अपनी पहचान बनाने के लिए नहीं है। तुम्हारे जीवन का एक गहरा आध्यात्मिक उद्देश्य भी है।

तुम्हारे हाथ कर्म करें, लेकिन उन कर्मों में अहंकार का विष न हो। तुम्हारी बुद्धि निर्णय ले, लेकिन उसमें विवेक का प्रकाश हो। तुम्हारा मन संसार में रहे, लेकिन संसार की इच्छाएँ तुम्हें इतना न बाँध लें कि तुम स्वयं को ही भूल जाओ।

परमात्मा का स्मरण वह आंतरिक दिशा है, जो मनुष्य को संसार के बीच रहते हुए भी अपने मूल उद्देश्य से भटकने नहीं देती।

परमात्मा से संपर्क टूटता नहीं, हमारा स्मरण टूट जाता है

जरा गहराई से विचार कीजिए। क्या कोई बच्चा अपने माता-पिता को भूल जाने से उनका बच्चा होना बंद कर देता है? नहीं। उसका संबंध बना रहता है, भले ही वह उन्हें याद न करे।

इसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से परमात्मा संपूर्ण सृष्टि का आधार हैं। मनुष्य उन्हें याद करे या न करे, इससे परमात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। लेकिन जब मनुष्य उनका स्मरण खो देता है, तब वह अपने जीवन में उस आध्यात्मिक संबंध की अनुभूति से दूर हो सकता है।

फिर वह अपनी इच्छाओं को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मानने लगता है। सुख मिलने पर अहंकार करने लगता है और दुःख मिलने पर पूरी तरह निराश हो जाता है। प्रशंसा मिलने पर स्वयं को महान समझता है और अपमान मिलने पर भीतर से टूट जाता है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसका मन बाहरी परिस्थितियों के साथ इतना जुड़ जाता है कि उसे अपने भीतर स्थित विवेक और चेतना का स्मरण नहीं रहता।

परमात्मा का स्मरण इस विस्मृति से बाहर आने का मार्ग है।

जब तुम सुबह उठते ही कुछ क्षण अपने परमपिता को याद करते हो, जब अपने कार्यों को प्रारंभ करने से पहले मन ही मन उन्हें प्रणाम करते हो, जब किसी कठिन निर्णय के समय सत्य और धर्म का विचार करते हो, और जब रात को सोने से पहले अपने दिनभर के कर्मों पर विचार करते हो, तब धीरे-धीरे तुम्हारे जीवन में स्मरण केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं रहता, बल्कि जीने की एक आध्यात्मिक पद्धति बन जाता है।

इसके लिए हर समय आँखें बंद करके बैठना आवश्यक नहीं है। आवश्यक है कि आँखें खुली होने पर भी तुम्हारे भीतर विवेक जागृत रहे।

संसार में रहो, लेकिन अपने परमपिता को मत भूलो

मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह संसार में रहते हुए संसार को ही अपना सब कुछ मान बैठता है। वह भूल जाता है कि जिन वस्तुओं को वह अपना कहता है, वे सभी परिवर्तनशील हैं। शरीर बदलता है, संबंधों की परिस्थितियाँ बदलती हैं, धन आता-जाता है, पद और प्रतिष्ठा भी स्थायी नहीं हैं।

ऐसे में यदि मनुष्य ने अपनी संपूर्ण पहचान केवल इन बाहरी उपलब्धियों पर टिका दी, तो उनके बदलते ही उसका मन भी डगमगाने लगेगा।

लेकिन यदि वह अपने जीवन में परमात्मा के स्मरण को स्थान देता है, तो उसे यह समझने में सहायता मिलती है कि संसार में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है, परंतु संसार की कोई भी भूमिका उसका संपूर्ण अस्तित्व नहीं है।

वह पिता भी है, पुत्र भी है, मित्र भी है, कर्मचारी भी है, व्यापारी भी है; लेकिन इन सभी पहचानों के पीछे एक ऐसा आंतरिक अस्तित्व है, जो इन भूमिकाओं से कहीं अधिक गहरा है।

परमात्मा का स्मरण मनुष्य को उसी गहराई की ओर लौटने का अवसर देता है।

इसलिए अपने जीवन में ऐसा भाव विकसित करो कि तुम संसार के सभी कार्य पूरी निष्ठा से करो, अपने परिवार से प्रेम करो, लोगों की सेवा करो, अपने उत्तरदायित्व निभाओ, लेकिन अपने हृदय में परमपिता के लिए भी एक स्थान सुरक्षित रखो।

जब क्रोध आए, तो उन्हें याद करो। जब अहंकार आए, तो उन्हें याद करो। जब लोभ तुम्हें गलत मार्ग पर ले जाने लगे, तो उन्हें याद करो। जब दुःख तुम्हें निराश करने लगे, तो उन्हें याद करो। और जब जीवन में सुख, सफलता तथा सम्मान प्राप्त हो, तब भी उन्हें मत भूलो।

क्योंकि परमात्मा का स्मरण केवल संकट के समय सहायता माँगने का साधन नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में अपने भीतर सत्य और धर्म को जीवित रखने का अभ्यास है।

अंतिम संदेश : कर्म संसार में, स्मरण परमात्मा का

कल्पना करो, यदि कोई बच्चा घर से दूर जाकर अपने जीवन में इतना व्यस्त हो जाए कि अपने माता-पिता को पूरी तरह भूल जाए, तो वह भले ही संसार में बहुत सफल हो जाए, लेकिन अपने जीवन के एक महत्वपूर्ण भावनात्मक संबंध से वंचित हो सकता है।

इसी प्रकार मनुष्य भी संसार की उपलब्धियों के पीछे दौड़ते-दौड़ते अपने आध्यात्मिक जीवन की उपेक्षा कर सकता है।

इसलिए भगवान श्रीकृष्ण का संदेश अपने जीवन में उतारो। संसार में रहो, अपने कर्तव्य निभाओ, परिश्रम करो, प्रेम करो, सेवा करो और अपने जीवन को सार्थक बनाओ। लेकिन इन सबके बीच उस परमपिता का स्मरण बनाए रखो, जो तुम्हारे जीवन की आध्यात्मिक यात्रा का आधार हैं।

तुम्हें हर समय संसार छोड़कर परमात्मा के पास जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने कर्म करते हुए अपने मन को सत्य, प्रेम, करुणा और परमात्मा के स्मरण से जोड़ना ही इस शिक्षा का सार है।

जब तुम्हारा कर्म संसार के लिए हो और तुम्हारे हृदय में परमात्मा का स्मरण बना रहे, तब संसार में रहते हुए भी तुम्हारी आध्यात्मिक यात्रा निरंतर चलती रहती है।

याद रखो, परमात्मा को स्मरण करना केवल उनका नाम लेना नहीं है; उनके बताए मार्ग पर चलना, अपने कर्मों को पवित्र बनाना और प्रत्येक परिस्थिति में विवेक को जीवित रखना भी उनका स्मरण है।

इसलिए आज से अपने जीवन में एक छोटा-सा संकल्प लो—

सुबह उठूँगा, तो अपने परमपिता को प्रणाम करूँगा।
दिनभर कर्म करूँगा, तो सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ूँगा।
सुख मिलेगा, तो अहंकार नहीं करूँगा।
दुःख मिलेगा, तो निराश होकर अपने कर्तव्य नहीं छोड़ूँगा।
और रात को सोने से पहले अपने दिनभर के कर्मों को याद करके स्वयं से पूछूँगा कि क्या आज मैंने अपने जीवन को थोड़ा और पवित्र बनाया?

यही वह स्मरण है, जो धीरे-धीरे मनुष्य के जीवन को बदल सकता है।

संसार में ऐसे जियो कि तुम्हारे कर्मों में ईमानदारी हो, तुम्हारे व्यवहार में प्रेम हो, तुम्हारे हृदय में विनम्रता हो और तुम्हारी चेतना में परमपिता का स्मरण बना रहे।

क्योंकि जब मनुष्य अपने परमात्मा को अपने जीवन से अलग नहीं मानता, तब उसका प्रत्येक सद्कर्म भी उसकी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा बन सकता है।

कर्म करते रहो, परमात्मा को याद करते रहो और अपने जीवन की दिशा को कभी विस्मृत मत होने दो।

+ posts

RECENT POSTS

BREAKING