समाज: सहयोग और सुरक्षा से सामाजिक दबाव तक
समाज क्या है? यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा है। संभवतः मनुष्य के सामाजिक जीवन की शुरुआत उसकी आवश्यकता से हुई थी। मनुष्य अकेले रहने वाला प्राणी नहीं था। सुरक्षा, भोजन, संसाधनों की उपलब्धता, संतानों की रक्षा और कठिन परिस्थितियों से मुकाबला करने के लिए मनुष्यों ने समूह में रहना शुरू किया। धीरे-धीरे यही समूह आपसी सहयोग, जिम्मेदारी और सुरक्षा की भावना पर आधारित व्यवस्था में बदलता गया, जिसे हमने ‘समाज’ कहा।
समाज का मूल उद्देश्य कभी किसी व्यक्ति को दबाना नहीं था, बल्कि व्यक्ति को अकेलेपन और असुरक्षा से बचाना था। समाज का अर्थ था—एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़ा होना, कमजोर की सहायता करना और सामूहिक रूप से बेहतर जीवन जीना।
लेकिन समय के साथ समाज की परिभाषा और उसका स्वरूप बदलता गया। आज कई जगह ‘समाज’ शब्द का अर्थ मनुष्यों के व्यापक समूह के बजाय किसी विशेष जाति या समुदाय के संगठन तक सीमित होकर रह गया है। गांव-देहात में छोटी-छोटी जातियों के नाम पर अलग-अलग सामाजिक समूह दिखाई देते हैं। इन समूहों का होना अपने आप में गलत नहीं है, क्योंकि अपनी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता को बनाए रखना स्वाभाविक मानवीय आवश्यकता है। समस्या तब शुरू होती है, जब समाज की एकता किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता से बड़ी मान ली जाती है।
कई स्थानों पर समाज के नाम पर व्यक्ति के निजी जीवन में हस्तक्षेप किया जाता है। किससे संबंध रखना है, किससे विवाह करना है, किसके घर जाना है, किसके साथ उठना-बैठना है—ऐसे व्यक्तिगत निर्णयों पर भी सामाजिक दबाव बनाया जाता है। कभी बहिष्कार का डर दिखाया जाता है, कभी सामाजिक प्रतिष्ठा का हवाला दिया जाता है और कभी समाज की तथाकथित मर्यादा के नाम पर व्यक्ति को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या समाज व्यक्ति के लिए बना है या व्यक्ति समाज के लिए?
यदि समाज मनुष्य की सुरक्षा, सहयोग और सम्मान के लिए बना था, तो फिर उसी समाज के नाम पर किसी मनुष्य का अपमान, बहिष्कार या मानसिक उत्पीड़न कैसे उचित हो सकता है?
समाज का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। समाज का मुखिया या नेतृत्वकर्ता समाज का मालिक नहीं होता। उसे अधिकार इसलिए मिलता है क्योंकि लोग उस पर विश्वास करते हैं। नेतृत्व का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ना है। नेतृत्व का अर्थ किसी की आवाज दबाना नहीं, बल्कि सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज सुनना है।
दुर्भाग्य से कई जगह सामाजिक नेतृत्व सेवा से अधिक सत्ता और अहंकार का रूप ले लेता है। कुछ लोग समाज की सामूहिक शक्ति को अपनी व्यक्तिगत शक्ति समझने लगते हैं। उनके निर्णय को ही समाज का निर्णय मान लिया जाता है और असहमति रखने वाले व्यक्ति को समाज विरोधी घोषित कर दिया जाता है। यह स्थिति समाज को मजबूत नहीं करती, बल्कि भीतर से कमजोर करती है।
किसी व्यक्ति को केवल इसलिए प्रताड़ित करना कि उसने समाज के प्रभावशाली लोगों की बात नहीं मानी, समाज व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक दबाव है। किसी परिवार को केवल इसलिए अलग-थलग कर देना कि उसने अपनी इच्छा से कोई निर्णय लिया, सामाजिक व्यवस्था नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय है।
हमें यह भी समझना होगा कि परंपरा और अत्याचार में अंतर होता है। परंपरा वह है जो पीढ़ियों को जोड़ती है; अत्याचार वह है जो किसी व्यक्ति के सम्मान और स्वतंत्रता को कुचलता है। संस्कृति वह है जो मनुष्य को अपनी जड़ों से जोड़ती है; रूढ़िवाद वह है जो मनुष्य को सोचने और अपने जीवन का निर्णय लेने से रोकता है।
आज समाज को फिर से अपने मूल उद्देश्य की ओर लौटने की आवश्यकता है।
समाज की पहचान इस बात से नहीं होनी चाहिए कि उसके पास कितने नियम हैं, बल्कि इस बात से होनी चाहिए कि उस समाज में कमजोर, गरीब, असहाय और अकेला व्यक्ति कितना सुरक्षित है।
एक आदर्श समाज वह नहीं, जहां हर व्यक्ति डर के कारण एक जैसा व्यवहार करे। आदर्श समाज वह है जहां अलग विचार रखने वाले व्यक्ति को भी सम्मान मिले। जहां गलती करने वाले को भी सुधरने का अवसर मिले। जहां विवाद का समाधान संवाद से हो, सामाजिक बहिष्कार से नहीं। जहां समाज का मुखिया सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सबसे पहले दूसरों की पीड़ा समझने वाला व्यक्ति हो।
जाति के आधार पर बने सामाजिक संगठन यदि अपने लोगों की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, विवाह संबंधी सहायता, गरीब परिवारों की मदद और सामाजिक उत्थान के लिए काम करें तो वे समाज के लिए उपयोगी शक्ति बन सकते हैं। लेकिन यदि वही संगठन व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने, डर पैदा करने और सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर दबाव बनाने लगें, तो उन्हें आत्ममंथन करना चाहिए।
क्योंकि समाज मनुष्य से बड़ा नहीं है। समाज मनुष्यों से मिलकर बना है।
जिस समाज में मनुष्य की गरिमा सुरक्षित नहीं, वहां समाज की बड़ी-बड़ी बातें भी खोखली हैं। जिस समाज में किसी गरीब, कमजोर या असहाय व्यक्ति की आवाज दबा दी जाती है, वहां सामाजिक एकता केवल दिखावा बनकर रह जाती है।
हमें ऐसा समाज नहीं चाहिए जिसमें लोग समाज से डरें।
हमें ऐसा समाज चाहिए जिस पर लोग भरोसा करें।
ऐसा समाज, जहां दुख में साथ मिले, संकट में हाथ मिले, गलती पर समझाइश मिले, अन्याय पर आवाज उठे और हर व्यक्ति को यह विश्वास हो कि समाज उसकी स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करेगा।
क्योंकि समाज की वास्तविक शक्ति लोगों को नियंत्रित करने में नहीं, लोगों को साथ लेकर चलने में है।
और शायद यही वह मूल उद्देश्य था, जिसके लिए मनुष्य ने पहली बार अकेलेपन को छोड़कर समूह में रहना सीखा था—सुरक्षा के लिए, सहयोग के लिए और एक-दूसरे को बेहतर जीवन देने के लिए; किसी एक व्यक्ति या समूह के अहंकार के लिए नहीं।

