जमीन अपनी, फिर भी हर कदम पर परमिशन क्यों? खरीद से घर बनाने और बेचने तक नियमों के जाल में फंसा आम आदमी
रायगढ़। जमीन खरीदना आम आदमी के जीवन का सबसे बड़ा सपना होता है। वर्षों की मेहनत और बचत से जब कोई व्यक्ति जमीन खरीदता है तो रजिस्ट्री के समय शासन को स्टांप ड्यूटी, पंजीयन शुल्क सहित निर्धारित शुल्क का भुगतान करता है। राजस्व विभाग की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जमीन उसके नाम पर नामांतरण भी हो जाती है। कागजों में वह जमीन उसकी हो जाती है, लेकिन असली परेशानी कई बार इसके बाद शुरू होती है।
सवाल यह है कि जब शासन ने जमीन की खरीद-बिक्री की पूरी प्रक्रिया पूरी कराकर व्यक्ति को उसका वैध मालिक मान लिया, तो उसी जमीन पर घर बनाने और बाद में उसे बेचने के लिए इतनी जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना क्यों पड़ता है? क्या इन प्रक्रियाओं का बोझ सबसे ज्यादा उस व्यक्ति पर नहीं पड़ता, जिसके पास सीमित आर्थिक संसाधन हैं?
पहला चरण: जमीन खरीदने की प्रक्रिया
जब कोई व्यक्ति जमीन खरीदता है तो सामान्य तौर पर उसे जमीन के दस्तावेजों की जांच, सौदा, स्टांप ड्यूटी और पंजीयन शुल्क का भुगतान तथा रजिस्ट्री की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके बाद राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण की प्रक्रिया होती है।
यानी सरकार के संबंधित विभाग जमीन के स्वामित्व और दस्तावेजों से जुड़ी निर्धारित प्रक्रिया पूरी करते हैं। नामांतरण के बाद खरीदार राजस्व रिकॉर्ड में जमीन का स्वामी दर्ज हो जाता है।
लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है—क्या नामांतरण के बाद भी जमीन के मालिक को अपनी जमीन का उपयोग करने के लिए हर बार अलग-अलग सरकारी अनुमति के चक्र में जाना जरूरी होना चाहिए?
दूसरा चरण: अपनी जमीन पर घर बनाने की तैयारी
जमीन खरीदने के बाद व्यक्ति का अगला सपना होता है कि वह उस पर अपना मकान बनाए। लेकिन जमीन का उपयोग कृषि से आवासीय करने की स्थिति में डायवर्सन जैसी प्रक्रिया सामने आती है।
आवेदक को निर्धारित दस्तावेजों के साथ आवेदन करना पड़ सकता है, संबंधित विभागों की जांच और शुल्क की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ सकती है। अलग-अलग स्थानीय परिस्थितियों और भूमि के प्रकार के अनुसार अतिरिक्त अनुमति या अनापत्ति प्रमाणपत्र की आवश्यकता भी हो सकती है।
यहीं से आम आदमी के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर शुरू होते हैं।
तीसरा चरण: नगर पंचायत या नगरीय क्षेत्र में अलग-अलग अनुमति
यदि जमीन नगर पंचायत अथवा अन्य नगरीय निकाय क्षेत्र में आती है तो भवन निर्माण से पहले स्थानीय निकाय की भवन अनुज्ञा, भूमि उपयोग, नक्शा स्वीकृति तथा आवश्यकता के अनुसार विभिन्न विभागों से NOC जैसी प्रक्रियाएं सामने आ सकती हैं।
कागज पर यह व्यवस्था नियोजन और सुरक्षित निर्माण के लिए बनाई गई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन सभी प्रक्रियाओं को आम नागरिक के लिए एक ही खिड़की या ऑनलाइन व्यवस्था के माध्यम से सरल नहीं किया जा सकता?
एक गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बार-बार कार्यालय जाना, दस्तावेज जुटाना, आवेदन करना और अलग-अलग विभागों से अनुमति लेना अपने आप में बड़ी परेशानी बन जाता है।
चौथा चरण: कृषि भूमि होने पर डायवर्सन की जरूरत
कृषि भूमि पर आवासीय निर्माण की स्थिति में भूमि उपयोग परिवर्तन अर्थात डायवर्सन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है। आवेदक को संबंधित राजस्व प्राधिकारी के समक्ष आवेदन करना पड़ सकता है और निर्धारित नियमों के अनुसार शुल्क एवं दस्तावेज प्रस्तुत करने होते हैं।
इसके अलावा स्थानीय नियोजन/टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से संबंधित स्वीकृतियां, भवन नक्शा तथा अन्य अनुमतियां भी भूमि की स्थिति और क्षेत्र के लागू नियमों के अनुसार आवश्यक हो सकती हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी समस्या तब सामने आती है जब आम नागरिक को यह स्पष्ट ही नहीं होता कि कौन-सा आवेदन किस विभाग में, कौन-सा दस्तावेज किस कार्यालय में और कौन-सी अनुमति पहले या बाद में लेनी है।
पांचवां चरण: घर बनाना भी आसान नहीं
किसी तरह डायवर्सन और आवश्यक अनुमतियां हासिल करने के बाद व्यक्ति अपने सपनों का घर बनाता है। निर्माण में उसकी वर्षों की कमाई लग जाती है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
जब किसी कारण से वही व्यक्ति भविष्य में अपनी जमीन और मकान बेचना चाहता है, तब उसे फिर से भूमि की स्थिति, डायवर्सन, भवन स्वीकृति और अन्य लागू नियमों की जांच तथा आवश्यक दस्तावेजों की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है।
छठा चरण: डायवर्सन जमीन बेचने पर फिर दस्तावेजों का सवाल
आवासीय उपयोग के लिए डायवर्ट की गई जमीन बेचने के दौरान खरीदार और विक्रेता को यह सुनिश्चित करना होता है कि जमीन के राजस्व रिकॉर्ड, डायवर्सन आदेश, भवन से संबंधित स्वीकृतियां और अन्य आवश्यक दस्तावेज सही एवं अद्यतन हों।
जहां लागू नियम अतिरिक्त अनुमति या प्रक्रिया निर्धारित करते हैं, वहां उसका पालन करना पड़ता है।
यहीं आम आदमी का सवाल फिर सामने आता है—जिस जमीन के लिए सरकार ने पहले रजिस्ट्री के समय शुल्क लिया, नामांतरण किया, फिर डायवर्सन की अनुमति दी और मकान बनाने की स्वीकृति दी, उसी जमीन को बेचते समय दोबारा इतनी जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया क्यों?
सबसे बड़ा सवाल: नियम जरूरी हैं या नियमों की जटिलता?
भूमि उपयोग, अवैध निर्माण, शहरों की अनियोजित वृद्धि, सड़क, नाली, पर्यावरण, अग्नि सुरक्षा और सार्वजनिक हित से जुड़े नियमों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब नियमों का उद्देश्य व्यवस्था बनाना हो और प्रक्रिया आम नागरिक के लिए बाधा बन जाए।
एक संपन्न व्यक्ति के पास वकील, आर्किटेक्ट, दस्तावेज लेखक और अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने के लिए समय व संसाधन हो सकते हैं। लेकिन दिहाड़ी मजदूर, छोटा किसान, निम्न आय वर्ग या मध्यमवर्गीय परिवार के लिए एक छोटी-सी अनुमति के लिए कई दिनों तक कार्यालयों के चक्कर लगाना आर्थिक नुकसान भी है।
सरकार से उठते हैं ये सवाल
1. जब जमीन की रजिस्ट्री और नामांतरण के समय सरकार स्वामित्व से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करती है तो उसके बाद की प्रक्रियाओं को इतना जटिल क्यों रखा गया है?
2. क्या जमीन खरीदने वाले व्यक्ति को रजिस्ट्री के समय ही यह स्पष्ट नहीं किया जा सकता कि भविष्य में उस जमीन पर मकान बनाने के लिए कौन-कौन सी अनुमति आवश्यक होगी?
3. डायवर्सन, भवन अनुज्ञा, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग तथा NOC जैसी प्रक्रियाओं के लिए सिंगल विंडो सिस्टम क्यों नहीं हो सकता?
4. क्या सभी आवेदन, शुल्क, दस्तावेज और स्वीकृतियां एक ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से नहीं दी जा सकतीं?
5. गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए इन प्रक्रियाओं को सरल और कम खर्चीला बनाने की व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए?
6. जब मकान बनाने की अनुमति देने से पहले सभी विभागों की जांच हो जाती है तो भविष्य में जमीन बेचने के समय उन्हीं दस्तावेजों की प्रक्रिया बार-बार क्यों दोहराई जाए?
जरूरत नियम खत्म करने की नहीं, प्रक्रिया सरल करने की
भूमि से जुड़े नियम खत्म करना समाधान नहीं है। लेकिन नियमों को इतना सरल जरूर किया जा सकता है कि ईमानदार नागरिक को अपनी ही जमीन के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें।
रजिस्ट्री से लेकर नामांतरण, डायवर्सन, भवन निर्माण अनुमति और अंततः बिक्री तक पूरी प्रक्रिया को एकीकृत करने की जरूरत है। सरकार यदि सिंगल विंडो, समयबद्ध स्वीकृति, ऑनलाइन दस्तावेज सत्यापन और एकीकृत भूमि रिकॉर्ड की व्यवस्था करे तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी कम होगी और आम आदमी का समय व पैसा भी बचेगा।
आम आदमी की मांग—जमीन मेरी है तो प्रक्रिया भी मेरी पहुंच में हो
भूमि खरीदने वाला व्यक्ति कोई नियम तोड़ना नहीं चाहता। वह सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क भी देता है और कानून का पालन भी करना चाहता है। उसकी मांग सिर्फ इतनी है कि कानून का पालन कराने की प्रक्रिया इतनी कठिन न हो कि वह सुविधा केवल पैसे और पहुंच वाले लोगों के लिए आसान रह जाए।
जमीन खरीदने से लेकर घर बनाने और फिर उसे बेचने तक यदि हर चरण में अलग-अलग दफ्तर, अलग-अलग अनुमति और अलग-अलग दस्तावेजों का बोझ बढ़ता जाए, तो सरकार को यह जरूर सोचना चाहिए कि व्यवस्था नागरिक की सुविधा के लिए है या नागरिक व्यवस्था की सुविधा के लिए?
यह बहस नियमों के खिलाफ नहीं, बल्कि नियमों को आम आदमी के लिए सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की जरूरत पर है।

