“बोर्ड पर बाईपास, सड़क पर ट्रक — घरघोड़ा बना भारी वाहनों का कॉरिडोर!”
घरघोड़ा, रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
नगर के प्रवेश द्वार पर साफ लिखा है — “भारी वाहनों का प्रवेश वर्जित है।”
लेकिन ज़मीन पर हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। ट्रक, डंपर और ट्रेलर सुबह 4 बजे से ही शहर के बीचों-बीच से ऐसे गुजरते हैं मानो उन्हें किसी विशेष अनुमति का संरक्षण प्राप्त हो। सवाल यह है कि जब नियम लागू हैं तो पालन क्यों नहीं हो रहा?
अंधेरे और सन्नाटे के बीच भारी वाहन शहर में प्रवेश करते हैं। उस वक्त आम नागरिक नींद में होते हैं और जिम्मेदार विभाग शायद अनजान। सड़कों पर कंपन महसूस होता है, घरों की दीवारें हिलती हैं और नियम पुस्तिकाओं में दर्ज प्रतिबंध कागज़ों तक सीमित रह जाते हैं।
🛣 बाईपास बना, पर उपयोग कहाँ?
शासन ने भारी वाहनों के लिए बाकायदा बाईपास रोड का निर्माण कराया है। उद्देश्य स्पष्ट था — शहर को जाम और दुर्घटनाओं से मुक्त रखना।
लेकिन जब शहर के भीतर से निकलने पर कोई सख्ती नहीं, तो वाहन चालक बाईपास का लंबा रास्ता क्यों अपनाएं?
यदि बाईपास का उपयोग सुनिश्चित नहीं किया गया तो वह केवल सरकारी उपलब्धि का एक और आंकड़ा बनकर रह जाएगा।
⚠ खतरे की आहट
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है।
सुबह टहलने निकलने वाले बुजुर्ग, स्कूल जाने वाले बच्चे, बाजार जाने वाले लोग — सभी संभावित खतरे के बीच से गुजरते हैं।
क्या प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतजार कर रहा है?
🚦 जिम्मेदारी किसकी?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है —
जब प्रतिबंध है तो उसका पालन कौन कराएगा?
पुलिस और परिवहन विभाग की भूमिका क्या है?
क्या नियम केवल आम नागरिकों के लिए हैं?
यदि कानून सभी के लिए समान है, तो भारी वाहनों को छूट क्यों ?
🗣 जनता की मांग
नगरवासियों की मांग है कि—
✔ सुबह और रात के समय विशेष चेकिंग अभियान चलाया जाए।
✔ शहर में प्रवेश बिंदुओं पर सख्त निगरानी हो।
✔ नियम तोड़ने वाले वाहन चालकों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
✔ बाईपास के अनिवार्य उपयोग को सुनिश्चित किया जाए।
घरघोड़ा की सड़कों पर गूंजती ट्रकों की आवाज़ मानो यही कह रही है —
“नियम तो हैं, पर लागू कब होंगे?”
अब देखने वाली बात यह है कि प्रशासन समय रहते कदम उठाता है या फिर किसी अप्रिय घटना के बाद ही व्यवस्था जागेगी।

