“जन्मों से भटका हूँ, जन्मों से उलझा हूँ” “बस अब तो मुक्ति,बस अब तो मोक्ष।”
“जन्मों से भटका हूँ, जन्मों से उलझा हूँ” — यह केवल एक व्यक्ति का कथन नहीं, बल्कि समूची मानव-चेतना की पुकार है। मनुष्य का जीवन मानो एक अनंत यात्रा है, जिसमें वह बार-बार जन्म लेता है, केवल शरीर के रूप में ही नहीं, बल्कि इच्छाओं, संबंधों, आकांक्षाओं और पीड़ाओं के रूप में भी। हर जन्म में वह कुछ पाने की चाह रखता है, कुछ खोने का भय पालता है, और इन्हीं के बीच उलझता चला जाता है।
यह भटकाव बाहरी नहीं, आंतरिक है। कभी सुख की तलाश में, कभी पहचान की खोज में, कभी प्रेम में, कभी सत्ता में—मनुष्य स्वयं से दूर होता चला जाता है। “उलझा हूँ” शब्द यह संकेत देता है कि समस्या संसार से नहीं, बल्कि मन की ग्रंथियों से है। अहंकार, वासना, लोभ, क्रोध और मोह—ये सब ऐसी डोरियाँ हैं जो आत्मा को बाँध लेती हैं।
और फिर आता है वह क्षण, जब यह थकान गहरी हो जाती है। जब आत्मा कह उठती है— “बस अब तो मुक्ति, बस अब तो मोक्ष।”
यह कोई पलायन नहीं है, बल्कि बोध है। मुक्ति का अर्थ मृत्यु नहीं, बल्कि अज्ञान से मुक्ति है। मोक्ष का तात्पर्य संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी उससे बँधे न रहना है। यह वह अवस्था है जहाँ इच्छाएँ शांत हो जाती हैं, जहाँ ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भेद मिटने लगता है, और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेती है।
मोक्ष कोई दूर का लक्ष्य नहीं, वह यहीं है—जब भटकना रुक जाए, जब उलझन सुलझ जाए, और जब मन पूर्ण स्वीकार में आ जाए। यही वह स्थिति है जहाँ जन्मों की यात्रा अर्थ पा लेती है, और आत्मा विश्राम करती है।

